बेरोजगारी बनाम बेकारी : एक विचार
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वर्तमान समय में हर तरफ एक ही आवाज आती है और वह है बेरोजगारी ,बेरोजगारी और सिर्फ बेरोजगारी ! लेकिन अगर हम समाज के बदलते स्वरूप का अध्ययन करें तो हमें समझ में आएगा कि बेरोजगारी उतनी है नहीं, जितनी दिखाई जा रही है । बढ़ते बाजारवाद और वस्तुओं की खपत से तो कहीं भी यह नहीं लगता कि लोगों के पास पैसा नहीं है । वर्तमान समय में हर घर में हर सुविधाएं मौजूद है । बाजार में बढ़ते उत्पादों की खपत इतनी तेजी से होती है उससे तो नहीं लगता कि बेरोजगारी बढ़ी है। मुझे लगता है बेरोजगारी नहीं बढ़ी है बेकारी ज्यादा बढ़ी है। आज तो बाजारवाद की इंतेहा है लोग गोबर को भी पैकट बंद कर के बेच सकते हैं फिर कहां पर बेरोजगारी है? लोग सुविधाओं के लिए कोई भी कीमत अदा करने के लिए तैयार है तो कहां बेरोजगारी है ??बस आवश्यकता है तो उस अवसर को पहचानने की और अपने कंफर्ट जोन से बाहर निकल कर मजबूत बनने की। आज से कुछ समय पहले इनमे से कितने जौब हमने सुने थे ??
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प्रश्न उठता है कि समाधान क्या है ???
शिक्षा के साथ-साथ गाइडेंस एंड काउंसलिंग को महत्वपूर्ण स्थान मिलना चाहिए। गाइडेंस एंड काउंसलिंग को महत्वपूर्ण नजरिए से देखा जाए जो बच्चे के साथ-साथ माता-पिता की भी काउंसलिंग करें और जॉब अपॉर्चुनिटी इसके बारे में बताएं साथ ही साथ डिग्निटी ऑफ लेबर का ज्ञान कराए कि कोई भी काम छोटा नहीं होता ।हर काम करने के लिए शौक बड़ी चीज है और सेवा भक्ति का भाव होना आवश्यक है ।जब तक पैसा मूल में होगा पैसा ही हमारे जीवन का उद्देश्य होगा ,तब तक विकास किसी भी हाल में संभव नहीं है ।शिक्षा के क्षेत्र में यह अध्याय आवश्यक रूप से जोड़ा जाना चाहिए। तभी बेरोजगारी की माला जपने वाले लोगों के पास हाथों में काम होगा और समाज में सुख शांति और समृद्धि।
नोट: लेखक के व्यक्तिगत विचार है
