सामान्य तौर पर भारत जैसे देश में बेटियों का बहिर्मुखी यानी एक्सट्रोवर्ट होना मर्यादा के खिलाफ माना गया है लेकिन जब सब चीजें बदल रही हैं तो माता-पिता की जिम्मेदारी बनती है की बेटियों को सिर्फ बोलना ना सिखाएं बल्कि सही समय पर सही तरीके से प्रस्तुत होना सिखाएं। गलत को गलत और सही को सही, साथ ही डिग्निटी( आत्मसम्मान) के साथ जीना सिखाएं। किसी भी पिता के लिए अपनी बेटी दुनिया की सबसे प्रिय संबंधों में से एक होता है । आश्चर्यजनक रूप से
पिता उसके लिए एक राजकुमार की तलाश में जीवन पर्यंत धन जोड़ता है और फिर एक सामाजिक समारोह में पैसे को पानी की तरह बहाते हुए बेटी विदा कर दी जाती है । माता-पिता अपने आपको कन्यादान कर धन्य समझते हैं। बधाईयों हो का तांता लगता है। लेन देन से लेकर सारे रिश्तेदारों के बारे में बातें होती हैं शिवाय बेटी की आगामी जीवन की ।
क्या आप जानते हैं कि हमारा समाज विभिन्न प्रकार की मानसिक विकृतियों से जूझ रहा है कारण चाहे कुछ भी हो विकृतियां मौजूद हैं और यही सत्य है। बंद कमरे के अंदर नाजो से पली बेटी किस प्रकार के माहौल में एडजेस्ट कर रही है?? ना तो कभी किसी को पता चलता है और ना ही इस विषय पर कोई चर्चा करता है। कुछ अनहोनी हो भी गई तो लड़की पर ही ब्लेम डाल दिया जाता है या से राम बेचारी कह कर छोड़ दिया जाता है।अगर बच्ची अंतर्मुखी है तो कहीं मेरे माता-पिता को दुख ना हो या “थोड़ा- बहुत तो सबको सहना पड़ता है” के जुमले के अंदर जीवन भर घुट घुट कर जीती रहती हैं। परिणाम स्वरूप जिस संतान को वह जन्म देती है ना वह सुखी रह पाती है और ना माता स्वयं। यहां पर ध्यान देने वाली बात यह है कि इस प्रकार की परेशानियों से सिर्फ गृहणियां ही नहीं बल्कि कामकाजी महिलाएं भी शिकार होती हैं।
प्रश्न उठता है कि इस समस्या का समाधान कैसे ढूंढा जाए ???
बेशक हम अंतर्यामी नहीं होते हैं कि दूसरे के मन की या उसके मानसिक व्यवहार का हमें पता चल जाए ।सामान्य तौर पर एक अच्छी नौकरी ,देखने में ठीक ठाक और समाज का तथाकथित चारित्रिक सर्टिफिकेट यही काफी होता है एक बेटी को विदा करने के लिए। यह सर्टिफिकेट भी एक अच्छी नौकरी के चकाचौंध के तले कहीं अंधेरे में गुम हो जाता है। हम दूसरे व्यक्ति को नहीं समझ सकते कि वह किस प्रकार के विकृति में पला बढ़ा इंसान है लेकिन अपनी बेटी को तो हम समझा सकते हैं ।भले बुरे का ज्ञान किसी भी प्रकार की हिंसा ना सहना और आवाज उठाने की शक्ति देना यह सब माता पिता के हाथ में होता है। बेटी को सक्षम बनाए सुदृढ़ बनाए और शादी के बाद अगर पारिवारिक रिश्ते ठीक चल रहे तो इंटरफेयर ना करें। लेकिन अगर ठीक ना चल रहे हो तो जरूर नजर बनाए रखें। हो सके जल्दी से जल्दी कानूनी सलाह लेकर बेटी को अपने घर में वापस लाएं । ऐसे समय में सहनशीलता का पाठ पढ़ाना और समाज का डर दिखाकर बेटी को उसी माहौल में रहने देना एक बहुत बड़ी गलती साबित हो सकती है।
ऐसा नहीं है कि जो लड़कियां अपने पैरों पर खड़ी नहीं है उन पर अत्याचार नहीं होते। अधिकतर मामलों में उन पर भी अत्याचार होते हुए पाए गए हैं। लेकिन कभी समाज की डर से, कभी माता-पिता की को दुखी ना होने की डर, से कभी बच्चों के सर से पिता का साया ना हटाने के डर से, बेटियां सहती ही रहती है।
बच्चों को सिखाएं समाज हम से बनता है हम समाज से नहीं बनते। इसलिए बच्चों को उनके अधिकारों की और कानूनी मामलों की जानकारी के साथ-साथ इतना मजबूत बनाएं कि वह सामान्य परिस्थितियों में परिवार को आसमान की ऊंचाई तक ले जाए तो विपरीत परिस्थितियों में अपना संबल बनाते हुए अपने जीवन को सुदृढ़ भी बनाए। बेटियों को बताएं कि जीवन भर सोना चांदी जमीन जोड़ने के स्थान पर अपने बच्चों को इस लायक बनाए आपको किसी धन की आवश्यकता ही ना हो। और आप स्वयं भी जीवन भर इतना पैसा एकत्रित ना करें कि वर पक्ष किसी भी प्रकार के लालच में आए । विवाह करें तो एक ही शर्त पर बेटी ही हमारा धन है स्वीकार है तो रिश्ता लीजिए वरना मत लीजिए। कुछ चीजें हैं जो हमने अगर संभाल दी तो जीवन संभल जाएगा अन्यथा रोज ही बेटियों की चीख पुकार काले अक्षरों से हर सुबह आपका स्वागत कर रही होंगी।
नोट: लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं
