प्रायः मनुष्य अपने रोजमर्रा के जीवन में नाना प्रकार की परिस्थितियों से गुजरता है। सकारात्मक परिस्थितियां जहां मनुष्य को सुख, स्थायित्व तथा आनंद का बोध कराती है वही नकारात्मक परिस्थितियां कभी-कभी हताशा, तनाव ,आंतरिक द्वंद की परिस्थितियां उत्पन्न करती है। अगर सूक्ष्मता से विश्लेषण किया जाए तो संसार द्वंदमय ही तो है यहां किसी भी स्थिति का द्वंदात्मक रूप विद्यमान है ।इन्हीं दोनों में निरंतर संघर्ष से मानव विकास व सभ्यता के पथ पर अग्रसर हुआ है।
बाल्यावस्था से ही प्रत्येक प्राणी अपने निर्धारित लक्ष्य की प्राप्ति के लिए प्रत्यनशील रहता है। लक्ष्य प्राप्ति के मार्ग में अनेक प्रकार के अनुभवों, तनाव, कठिनाइयों से गुजरता है ,वह लक्ष्य प्राप्त करने के पश्चात उस स्थिति को यथावत बनाए रखने में भी निरंतर बाह्य व आन्तरिक कारको से संघर्ष करता हुआ यदा कदा जीवन मूल्यों से भी समझौता करता है इस प्रकिया मे जीवन के सार को विस्मृत कर देता है। उसकी अधिकांश ऊर्जा स्वयं के बनाए मानवीय संबंधों ,भौतिक सुविधाओं व पर्यावरण के साथ तादात्म्य स्थापित करने में ह्रास हो जाती है ।मनुष्य की यह पूरी कवायद अपने को व्यवस्था में अक्षुण्ण बनाए रखने की है जिसमें वह भूल जाता है अपनी मृत्यु को, जो हर बीते हुए पल के साथ करीब आती जाती है। प्रतिफल मनुष्य मृत्यु के भय के साथ जीवन जीता है लेकिन मृत्यु को स्मरण रख जीवन को जीवंतता के साथ जीना भूल जाता है ।
महाभारत में एक रोचक प्रसंग आता है जब अर्जुन के समक्ष युद्ध आरंभ होने से पूर्व उसके ही स्वजन ,गुरुजन विपक्षी खेमे में दृष्टिगोचर होते हैं तो अनायास ही उसके मस्तिष्क में युद्ध से पलायन के विचार आते हैं ।भगवान श्री कृष्ण उसे सखा और सारथी भाव के रूप में उपदेश देते हैं की मृत्यु तो तेरी निश्चित है युद्ध में लड़ते हुए मारा गया तो भावी पीढ़ियां सम्मान के साथ तेरा जय जयकार करेगी और यदि कायरो की भांति मरा तो पीढ़ियों तक अपयश भोगेगा अतः नीति अनुसार युद्ध रूपी कर्तव्य कर्म करते हुए मृत्यु को प्राप्त होना श्रेयस्कर है ।मानव जीवन भी इसी प्रकार युद्धक्षेत्र है जहां आंतरिक व बाह्य स्तर पर यदा-कदा संघर्ष की स्थिति विद्यमान रहती है। मनुष्य ब्रह्मांड रूपी बृहद व्यवस्था का सूक्ष्म अंश मात्र है जो कुछ समय के लिए पूर्व कर्मों व प्रकृति की व्यवस्था के अनुसार संसार में थोड़े अंतराल के लिए व्यक्त हुआ है। उसका अस्तित्व संसार से नहीं है वरन उसकी निश्चित भूमिका है जिसमे प्रकृति भूमिका के निर्वहन के लिए सहयोग कर रही है।
अतः आवश्यक है जीवंतता के साथ पद, प्रतिष्ठा ,धन, ऐश्वर्य , मान सम्मान के प्रभाव से मुक्त होकर सत्य और धर्म के अनुसार जीवन को आनंद के साथ जिया जाए।
मृत्यु की शाश्वतता को दृष्टिगोचर रख जीवन को सार्थक बनाया जाए व जीवन मूल्यो और अपनी अंतरात्मा के साथ समझौता न करते हुए अपने स्वाभिमान को बनाए रखा जाए।
जीवन मूल्यों की मृत्यु से कहीं बेहतर है उन मूल्यों को बरकरार रखने के लिए संघर्ष करते हुए मृत्यु को प्राप्त हो जाना।
इंद्रियों के क्षीण होने पर अतीत में किए गए समझौतावादी दृष्टिकोण पर पश्चाताप से अच्छा है कि प्रतिपल जीवन की परिस्थितियों का सामना करते हुए असीम असंतोष और आनन्द का अनुभव करना
